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Wednesday, November 5, 2025

वैदिक वास्तुशास्त्र :

वैदिक वास्तुशास्त्र :

वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से आपके घर की बालकनी, :

वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से घर की बालकनी महत्वपूर्ण होती हैं...! 

हालांकि उसकी ओर हम ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हैं। 


अगर बालकनी वैदिक वास्तुशास्त्र के अनुसार बन पाए एवं उसका रखरखाव भी वास्तु निर्देशों के अनुरूप हो...! 

तो पूरे मकान अथवा फ्लैट को सकारात्मक ऊर्जा का लाभ दिलाने में अहम भूमिका निभाती है।



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जब पूर्व में हो बालकनी : -


वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से बालकनी पूर्व दिशा में बनी हो...!

तो यह आपके पूरे घर के लिए लाभदायक है और घर में सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए इसे सर्वाधिक साफ - सुथरा रखें।

इसी दिशा से सुबह के समय सूर्य भगवान की सकारात्मक किरणें आपके घर में प्रवेश करती हैं, अतः यहां बड़ा एवं भारी सामान न रखें।

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यहां तुलसी का पौधा रखें लेकिन यहां बहुत ज्यादा भारी गमले न रखें।

घर का कोई भी टूटा - फूटा सामान, रद्दी आदि यहां न रखें।

सूर्य को जल देने के लिए इस बालकनी के लगभग बीच का भाग प्रयोग करें।

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जब पश्चिम में हो बालकनी : -


वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से आपके घर अथवा फ्लैट की पश्चिम दिशा में बालकनी हो...! 


तो इसे दोपहर के बाद परदे से थोड़ा - बहुत कवर कर लेना चाहिए...! 

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क्योंकि वास्तु के अनुसार पश्चिम की दिशा से क्षीण या नकारात्मक ऊर्जा ही प्रवेश करती है।

यहां साइज तथा वजन में कुछ भारी गमले और पौधे का प्रयोग कर सकते हैं।


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जब उत्तर दिशा में हो बालकनी : -


वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से आपके मकान अथवा फ्लैट की बालकनी उत्तर दिशा में बनी हो तो इसे भी पूर्व दिशा की बालकनी के समान साफ - सुथरा रखें।


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यदि निर्माणाधीन मकान में आपकी पसंद के अनुसार, बालकनी बनाने की आपको स्वतंत्रता हो...! 

तो पूर्व, उत्तर एवं पूर्वोत्तर के ईशान कोण में बड़ी बालकनी का बनाना वास्तु सम्मत है...! 

ऐसी बालकनी भवन को विस्तृत आधार एवं सकारात्मक ऊर्जा देती है।

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जब दक्षिण दिशा में हो बालकनी : -


वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से बालकनी मकान या फ्लैट की दक्षिण दिशा में बनी हो...! 


तो यहां ऊंची और लटकने वाली विभिन्न प्रकार के फूलों वाली या सजावटी बेलें लगाएं।

दक्षिण दिशा की बालकनी के एक हिस्से में आप कुछ ऐसे ही सामान रख सकते हैं...! 

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जिनका इस्तेमाल आपको फिलहाल नहीं करना होता।

यदि दक्षिण दिशा की बालकनी वाला भाग मकान का फ्रंट या आगे वाला भाग बनता हो...! 

तो इस बालकनी को आकार में अपेक्षाकृत बड़े पौधों से सजाया जा सकता है।

बालकनी चाहे किसी भी दिशा में बनी हो, हमेशा साफ - सुथरी होनी चाहिए...! 

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क्योंकि प्रायः वहां एक या एक से अधिक खिड़कियां और दरवाजे भी होते ही हैं और ब्रह्मांडीय ऊर्जा हमेशा घर की खिड़कियां और दरवाजों के रास्ते ही घर में प्रवेश करती है। 

अब यदि ऊर्जा के प्रवेश करने का मार्ग ही साफ - सुथरा न हो...! 

तो नकारात्मक तरंगें ही हमारे घर में आएंगी, जिससे घर में अशांति का वातावरण बन सकता है।


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वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से व्यापार में सफलता व घर की समृद्धि : -


वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से  घर, दुकान और कार्यालय में सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि व सफलता बनाए रखने के लिए बहुत ही सरल वास्तु नियम हैं...! 


जैसे बैठने की दिशा, दर्पण का स्थान, ऋण लेने के शुभ - अशुभ दिन इत्यादि के बारे में ध्यान रखें।

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वैदिक वास्तुशास्त्र की दृष्टि से  दुकानदार तथा दुकान के कर्मचारी को अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए....! 

कि वह पूर्व या उत्तर की तरफ मुख करके बैठें, दक्षिण या पश्चिम की ओर मुख करके बैठने से प्रायः अर्थ हानि एवं कष्ट होता है।

सोने के कमरे में आईना होना अपशकुन माना जाता है। 

बिस्तर के बिल्कुल सामने आईना नहीं रखना चाहिए। 

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इस से पति पत्नी के बीच मन मुटाव होता है। 

अगर आईना बिल्कुल बिस्तर के सामने हो तो उसे हटा दें या फिर परदा लगा दें।

रविवार एवं मंगलवार को, संक्रांति के दिन, वृद्धि योग में, हस्त नक्षत्र में बैंक आदि से कर्ज नहीं लेना चाहिए। 

इन मुहूर्तों में ऋण ( कर्ज ) लेने वाला व्यक्ति सदैव ऋणी रहता है।

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मंगलवार को कभी भी ऋण ( कर्जा ) नहीं लेना चाहिए। 

यदि आप जल्दी से जल्दी कर्ज के बोझ से छुटकारा चाहते हैं तो कोशिश करें कि कर्ज का पैसा मंगलवार को ही लौटाएं।

वैसे तो कर्ज कभी नहीं लेना चाहिए लेकिन अगर मजबूरी वश लेना ही पड़े तो कोशिश करें कि कर्ज बुधवार को ही लें।

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घर के दरवाजे के हत्थे पर तीन चीनी सिक्कों को, लाल रंग के रिबन या धागे से बांध कर दरवाजे के ऊपर की ओर लगाना चाहिए। 

इस से घर में लक्ष्मी आती है। 

इसे अपने बटुए में और गल्ले में भी रख सकते हैं।

घर के कमरे में एक के बाद एक, एक ही पंक्ति में, तीन दरवाजे नहीं होने चाहिए। 
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इस से शुभ ( सकारात्मक, पॉजिटिव ) ऊर्जा जल्दी से निकल जाती है और अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

प्रतिदिन घर, दुकान एवं प्रतिष्ठान की सफाई करते वक्त पानी में थोड़ा नमक मिलाकर पोंछा लगाना चाहिए। 

यह नमक मिला पानी ‘‘नकारात्मक’’, ‘‘अशुभ’’ ऊर्जा को बाहर निकालने में सहायक होता है। 

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इस सरल प्रयोग से घर, दुकान अथवा प्रतिष्ठान के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

दफ्तर में दरवाजे की ओर पीठ करके नहीं बैठना चाहिए। 

इस से विश्वासघात की संभावना रहती है। 

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दफ्तर में हमेशा इस तरह बैठना चाहिए कि दरवाजा आंखों के सामने हो, जिससे दफ्तर में आने वाले लोगों को अच्छी तरह देख सकें।

यदि आपका व्यापार मंद चल रहा है तो दक्षिण दिशा की चार दीवारी के मुंडेर पर ईटों की चिनाई कराकर उसे ऊँचा करा दें...! 

दक्षिण की दीवार ऊंची करने पर आप स्वयं अपने व्यवसाय में तेजी अनुभव करेंगे।

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व्यापार हो या निवास करना कौन-से आकार-प्रकार का भूखण्ड शुभ रहेगा आपके लिए :

वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार किस प्रकार के भूखण्ड पर आप निवास करते हैं अथवा व्यापार, जानें वास्तु शास्त्र के अनुसार कौन - सा भूखण्ड व्यापार के लिए शुभ है और कौन - सा निवास के लिए शुभ है। 

वैदिक वास्तुशास्त्र में भूमि खरीदते वक्त उसके आकार और कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक माना गया है।


वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार  भूखण्ड को खरीदने से पहले उसकी मिट्टी आदि के परीक्षण के बाद भूखण्ड के आकार - प्रकार को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। 

वर्गाकार भूखण्ड, आयताकार भूखण्ड, गोलाकार भूखण्ड, त्रिकोणाकार भूखण्ड, चक्राकार भूखण्ड, शकटाकार भूखण्ड, पंखाकार भूखण्ड, तबलाकार भूखण्ड, शूर्पाकार भूखण्ड के बाद आइए जानते हैं कुछ और भूखण्डों के आकार - प्रकार के बारे में।

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गोमुखाकार भूखण्ड-  


गोमुखाकार भूखण्ड- गोमुखाकार भूखण्ड की लम्बाई सामने से कम तथा पीछे की तरफ से अधिक होती है। 


निवास करने के लिए इस आकार का भूखण्ड सर्वाधिक शुभ माना जाता है। 

भूमि स्वामी के लिए गोमुखी भूमि पर मकान बनवाकर निवास करना उत्तम है, परन्तु वास्तु शास्त्र के अनुसार व्यापार - व्यवसाय के लिए गोमुखी भूखण्ड का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

गोमुखाकार भूमि को व्यापार - व्यवसाय के लिए प्रयोग करने पर ग्रहदशा निर्बल होने पर हानि की संभावनाएं अधिक होती हैं।

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सिंहमुखाकार भूखण्ड- 


सिंहमुखाकार भूखण्ड- जिस भूखण्ड के सामने यानि आगे की लम्बाई अधिक हो तथा पीछे की ओर से कम लंबाई हो, वह सिंहमुखाकार सिंहमुखी भूखण्ड कहलाता है। 

सिंहमुखी भूखण्ड व्यापार - व्यवसाय करने के लिए अति उत्तम माना जाता है। 

इस आकार के भूखण्ड पर व्यापार करने पर व्यापार दिन - दूनी, रात - चौगुनी तरक्की करता है, लेकिन इस आकार के भूखण्ड पर वास्तु शास्त्र के अनुसार निवास करना उत्तम नहीं माना जाता।

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टी आकार का भूखण्ड- 


टी आकार का भूखण्ड- जिस भूखण्ड का आकार अंग्रेजी के टी अक्षर के समान दिखाई पड़े, उसे वास्तु शास्त्र के अनुसार अशुभ फलदायी समझना चाहिए। 

वास्तु शास्त्रियों के अनुसार इस आकार का भूखण्ड कष्टकारक, रोगकारक तथा अनिष्टकारक हो सकता है। 

दोनों तरफ निकली हुई अतिरिक्त भूमि को किसी वास्तु शास्त्री की सलाह से अलग कर टी आकार भूखण्ड को सही किया जा सकता है।

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षट्कोणाकार भूखण्ड- 


षट्कोणाकार भूखण्ड- जिस भूखण्ड की छः भुजाएं दिखाई पड़ें, उसे षट्कोणाकार भूखण्ड कहा जाता है। 

षट्कोणाकार भूखण्ड पर निवास करना भूस्वामी के लिए शुभप्रद माना गया है, क्योंकि दो दिशाओं से त्रिकोणाकार होने के कारण कोई अशुभ प्रभाव नहीं पड़ता है। 

वैदिक वास्तु शास्त्र के अनुसार संशोधन करने पर यह भूखण्ड धन, संपदा का लाभ एवं विशेष उन्नति प्रदान कर सकता है।

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अष्टकोणाकार भूखण्ड- 


अष्टकोणाकार भूखण्ड- जिस भूखण्ड के आठ कोण होते हैं, उसे वैदिक वास्तु शास्त्र की शब्दावली में अष्टकोणाकार भूखण्ड कहा जाता है। 

यह भूखण्ड भी षट्कोणाकार भूखण्ड की भांति भूस्वामी के लिए शुभफलदायक माना जाता है।

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